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Wednesday, September 13, 2017

व्यंग्य : कॅरियर चौपट !



-धीतेन्द्र कुमार शर्मा-

स्साला अपना तो कॅरिअर चौपट हो गया। भ्रूण हत् या ही समझो! कब से सोच रहा। धंधा बदलने की। अभी वाले में टेंशन बहुत। दिन दिखता, न रात। चौबीस घ्ंाटे की मगजमारी।  लेने-देने के नाम पर कुछ खास नहीं। बाबाजी ही समझो। बीस साल में कहां पहुंचे। वापस वहीं, जहां से चले। जीरो प्वाइंट! कोई न अंदर पूछता, न बाहर! ज्ञान भी किसको बांटे। नई पीढ़ी के  सुनते नहीं, पुराने दिखते नहीं।  तो फिर...? बाहर बाजार में हाल खराब अलग! सो, अरसे से मंथन चल ही रहा था। धंधा बदल लें। कई पर विचार किया। पर, खुद के नम्बर आत्ममूल्यांकन में कम आते। बात खत्म हो जाती। फिर, आखिर दिशा दिखने लगी थी। लगा था कि ये ठीक रहेगा। ठीक क्या... उत्तम, अति उत्तम। वैरी स्मार्ट! यूं भी रोज सैंकड़ों मैदान में कूद रहे...भन्नाट दौड़ भी रहे। ट्रेंड कर रहा है आज के मार्केट मेंं।

सो, माहौल भी बनाने लगा था मैं तो! शास्त्रों का रट्टा मारता रहा। कुछ-कुछ याद भी रहने लगा। यूं कहें कि संकल्प करने लगा था। घरवालों को भी दिक्कत नहीं थी। इनवेस्टमेंट कुछ था नहीं। बिन हल्दी-फिटकरी चटख रंग।  अभ्यास के लिए टीवी से भी चिपका रहता। माताजी-पिताजी के साथ। बड़े भक्तिभाव से। रोजाना....बे-नागा। बल्कि इससे तो प्रेरणा और मजबूत होती। नित्य संकल्प बढ़ता। सीखने के साथ ही आत्म मूल्यांकन भी करता। यहां अपने नम्बर हमेशा ज्यादा दिखे। नंबर ज्यादा देख प्रसन्नता होती और संकल्प मजबूत।

बाजार तो जैसे दरिया है। समंदर सा विशाल। ज्यादा मोल-भाव की चिकचिक भी नहीं। पैर-पूजन तक का रिवाज। आनन्द जन्नत सा! नतग्रीव, साष्टांगार्पित सेवाभाव! कहां ऐसे ग्राहक आज की दुनिया में?  मन गुदगुदाता, 'अपन तो फिट हो ही जाएंगे। फिट क्या, रंग जमा लेंगे। अद्भुत! मां लक्ष्मी की अतुलनीय कृपा भी। कदम चौड़े में बढऩे लगे थे। रिश्तेदारी-दोस्तों में चर्चाओं का दौर भी। निकट रिश्तेदार ने 'ऊपर सिर पर हाथÓ रखने वाले भी खोजे। कई नाम पर चर्चा के बाद तीन-चार पर आ टिके। जुगाड़ का दौर शुरू हो गया था। राजनीतिक रसूखात की पाइपलाइन भी चैक कर ली। यहां तक कि वक्त तक मुकर्रर अघोषित रूप से कर दिया था कि, तैयारी मार्जिन के इत्ते समय बाद अमुक शुभ दिन से शुरू कर देंगे। कहां से, कैसे होगा, इस पर एक्सरसाइज की जिम्मेदारियां दी गई।

...पर वो स्साला काला दिन सब शगुन बिगाड़ गया। सब गुड़-गोबर कर गया। पच्चीस अगस् त ही था ना वो। हां-हां, अभी निकला वही। टीवी पर अपने स्मरण-श्रवण अभ्यास में चिपका था कि   चैनल बदल लिया। समाचार लग गए। बस यहीं सब राम-रहीम हो गया। खबरें बढऩे के साथ घरवालों का वीटो आंखों में दिखने लगा। रही सही कसर तीन दिन बाद 28 को पूरी हो गई। उस दिन चैनल बदलने की जरूरत नहीं पड़ी। घरवाले पहले ही टकटकी लगाए बैठे थे। दोपहरी में ही ज्यों-ज्यों खबरें आईं, अपने कीलें ठुकती गई। बैरी चैनल वाले भी कहां पीछे रहते। राम-रहीम के साथ आसाराम, राम पाल, रामवृक्ष सबको न्योतते चले गए। इधर, मुंडन हमारा होता गया। बुजुर्गों को याद नहीं था तो इन्होंने दिला दिया। शाम होते-होते तो भइये दुकान ही बंद हो गई। प्रवचन उल्टे शुरू हो गए....'अच्छा तो ऐसे होती है ये बाबागिरी! सत्ता-आसन और पथ-भ्रष्टा मार्ग तक की व्याख्या हो गई। 'इंसां के कारनामे उगलते चैनल हमारे कॅरियर का ताबूत बनाते चले गए। गुफा-कंदराओं के रहस्य कब्र खोदते गए। और भइये!  रात की भोजन-प्रसादी के बाद पारिवारिक सत्ताध्यक्ष (पिताजी) उपाध्यक्ष (माताजी) और गृह मंत्रीजी (बताने की जरूरत नहीं) ने दो टूक कह दिया 'खबरदार जो कथावाचन का नाम भी लिया तो....चैप्टर क्लोज। जो कर रहे, करते रहो। हमने कुछ नहीं कमाया पचास सालों में, सिर्फ इज्जत है, इसे यूं चैनलों पर नीलाम नहीं करनी बरखुरदार। अपन वापस उसी जीरो प्वाइंट पर!

                                     dhitendra.sharma@epatrika.com/ dhitendra.sharma@gmail.com   

आस्था और व्यवस्था में संतुलन जरूरी

यहां पर्वों के उत्साहपूर्ण आयोजनों को संकुचित करने अथवा बांधने का सुझाव देने की मंशा कतई नहीं है। ना ही आम रास्तों के अवरुद्ध होने से जूझती ...