Sunday, December 22, 2019

मानो कुछ अप्रत्याशित न था उसके मोहल्ले में...

    श्रीनाथपुरम स्टेडियम के पास वारदात के बाद लगी भीड़।

संदर्भ- #रणवीरचौधरीहत्याकांड  #KotaGangwar

-धीतेन्द्र कुमार शर्मा-
शाम करीब पौने आठ बजे (रविवार, 22 दिसंबर) पिताजी ने टीवी स्क्रीन पर आई पट्टी कोटा में हिस्ट्रीशीटर रणवीर चौधरी की गोली मारकर हत्या पढ़ा तो मेरे कान खड़े हो गए। पौने छह वर्ष की वय से इस शहर में चंबल का पानी पीने और 20 वर्ष के पत्रकारीय कर्म के चलते यह नाम मेरे लिए अपरिचित न था। इस बीच डेढ़ वर्ष झालावाड़, फिर 2 वर्ष से कोटा में पदस्थापन ने इस दिशा में और ज्ञानवर्धन किया। प्रोपर्टी विवाद, लूट, हत्या और मारपीट जैसे कृत्यों में यह नाम बड़े अक्षरों में आता था। दो गैंगस्टरों के साथी के रूप में कार्य करने का ठप्पा भी इस नाम के साथ है। पिताजी के टीवी की पट्टी पढऩे के वक्त मैं कुछ जरूरी कार्य निपटा रहा था। यूं भी मीडिया का ध्वज बुलंद करने वाले कई बैनर फेसबुक लाइव कर रहे थे (भले ही आरोपियों से जुड़े संगठित अपराध जगत के सरगना उन्हें देख मौके की जानकारियां जुटा रहे हों।)। कुछ वीडियो में तो नाकाबंदी करो, व्हाइट गाड़ी थी...जैसे पुलिस अधिकारियों के वाक्य तक सुनाई दे रहे थे। सो मैं अपना काम निपटाता रहा। घटना के बाद मौके पर पहुंचे एक टीम सदस्य से फीडबैक बराबर आ रहा था।

                                  वारदात की तीन घंटे बाद रणवीर के मोहल्ले में पसरा सन्नाटा।

घटना के करीब तीन घंटे बाद करीब, सवा नौ बजे मैं टीचर्स कॉलोनी की ओर पहुंचा। चौथ माता मंदिर के पास स्थित रणवीर के आवास ना तो ऐसी कोई शोकाभिव्यक्ति वाली भीड़ थी जो आम तौर पर सामान्य गमी में होती है, और ना ही अखबारी और इलेक्ट्रोनिक मीडिया की भारी-भरकम शब्दावली जितनी सनसनी मुझे महसूस हुई। मोहल्ले में खड़ी एक दर्जन कारें जो प्राय: यहां नहीं दिखती हैं, नजर आई। और, घर के बाहर एक दर्जन करीब लोग खड़े थे। करीब 13 डिग्री सेल्सियस तापमान और पांच किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चल रही शीतलहर में थोड़ी गर्माहट थी तो वह सिर्फ चार-पांच जनों के बने 50 से 70 मीटर दूर-दूर छितराए समूहों में हो रही तटस्थ कानाफूसी और रोजमर्रा में नुक्कड़ पर जलते दो-तीन अलावों की। मंदिर के चारों ओर के मोहल्लों में एक सन्नाटा सा पसरा था। मैंने कुछ समूहों की चर्चा में गुमनामी शिरकत भी की। कहीं कोई अप्रत्याशना-महसूस नहीं हुई। ना विशेष शिकन दिखी, ना ही विचलन।  संभवत: मोहल्लेवासी मृतक के कथित प्रोफेशन से परिचित थे। यूं भी ऐसे मसलों का हश्र किसी भी विवेकसमृद्ध मनुष्य से छिपा नहीं होता। दीर्घायु का दावा शायद ही कोई कर पाए। तथ्यों पर शांत चर्चा जरूर थी। वारदात से आधे घंटे पहले मोहल्ले के लोगों ने उसे स्कूटर पर निकलते देखा था। अमूमन वह अपनी कार से ही दिखता था। थोड़ी देर बाद कार मंगाई बताई। उसके बाद घटना हो गई (हालांकि मीडिया रिपोट्र्स में उसे कार से जाना और पीछा कर रहे युवकों द्वारा ताबड़तोड़ गोली मारना बताया गया है।)। चर्चा यह भी थी कि स्टेडियम में खेलने जितना वक्त आज नहीं लगा। घटना और मोहल्ले से निकलने के बीच आधा घंटे का ही फासला था। तो क्या घटना का अहसास या कोई इनपुट मिल गया था उसे लेकिन निकल नहीं पाया। या महज संयोग रहा। जितने समूह, उतनी बातें। एक टोली में तीन दिन पहले बुलट बाइक पर तीन युवकों के रात में 9-10 बजे नशे में आकर रणवीर का पता पूछने की बात भी थी। गाली-गलौज के साथ उन्होंने यह भी कहा बताया कि बड़ा दादा बन रहा, निकालनी पड़ेगी। खैर, ये सब सुस्त चर्चाएं थी।
करीब साढ़े 10 बजे मैं मोहल्ले से निकल महावीर नगर थर्ड चौराहा, टीचर्स कॉलोनी मोड़ से आगे जाकर पीछे के मोहल्ले होता हुआ पुन: मंदिर तक लौटा। पंद्रह मिनट के इस पैदल दौरे में मैनरोड पर जरूर दो पुलिस गाडिय़ां दौड़ती दिखी। बाकी जनजीवन रोजमर्रा की तरह सामान्य था। चाट ठेलों से लेकर राहगीरों में चर्चा जरूर थी। हत्यारों के रावतभाटा की ओर भाग निकलने  के कयास भी। इधर, अब तक दो चार ही लोग घर के बाहर थे। तापमान में एक डिग्री की कमी होते और गहराती रात के साथ वे भी चले गए। रात 12 बजते बजते मोहल्ले में पूरी तरह सन्नाटा हो गया।

गैंगवार कोटा के लिए ना तो नई बात है और ना चकित करने वाली घटना। और, जिन लोगों पर या जिस गैंग पर संदेह जताया जा रहा है, पुराने लोग उनके इसी शहर में ऑटो चलाने तक के किस्से जानते हैं। बृजराज सिंह, लाला बैरागी, भानुप्रताप सिंह, रमेश जोशी समेत तमाम मामले लोगों के जेहन में है। शेष में अब कौन किसके निशाने पर संभव है, इससे भी संभवत: पुराने लोग वाकिफ हैं। बहरहाल, वक्त के साथ ये चीजें कम हो रही हैं। गैंगस्टर्स ने भी प्रोफेशनल रूप ले लिया तभी तो रणवीर के दशकों से इस संभ्रांत माहेल्ले में निवास होने के बाद भी दबाव या तनाव या झगड़े का कोई एक उदाहरण नहीं है। कई नए लोग तो यह तक नहीं जानते थे कि अखबारों में छपने वाला नाम रणवीर उनके पड़ोस वाला ही है। उसकी छवि एक अन्तर्मुखी व्यक्तित्व के रूप में थी। वर्चस्व की लड़ाई कहें या प्रोफेशनल होने के कारण कारोबार विस्तार, हितों का संघर्ष आदि। कानून से इतर ये ही आपस में स्वनिर्णीत न्याय कर रहे हैं। इस तरह की वारदातें नितांत निजी ही होती हैं। हत्यारे टारगेट पर ही आए थे तभी ताबड़तोड़ सिर में गोलियां दागी। भागने की सुविधा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने के साथ ही वक्त और स्थान ऐसा चुना कि कोई अन्य हताहत न हो।

लिहाजा, ओजस्वी अखबारबाजों-मीडिया धुरंधरों की प्तदिनदहाड़ेफायरिंग, प्तकोईसुरक्षितनहीं, प्तअसुरक्षितकोटा, जैसी सनसनीखेज विद्वतापूर्ण शब्दावली से अप्रभावित रहकर समाज को इन्हें एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना और सिर्फ घटना की तरह लेना चाहिए। स्टेडियम और समीपवर्ती 500 मीटर में जमा भीड़ को छोड़ दें तो सुभाष सर्किल, तीन बत्ती, संतोषी नगर से रणवीर के मोहल्ले तक निवासरत समाज का बहुत बड़ा हिस्सा शायद यही संदेश दे रहा था। कानून अपना काम कर ही रहा है।  वारदात में उपयोग ली गई गाड़ी पुलिस ने तत्काल डिटेन कर ली, भरोसा किया जाना चाहिए कि जल्द आरोपी पकड़े जाएंगे और न्याय व्यवस्था निर्णय देगी। #GangsOfKota

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Monday, December 9, 2019

#Life_Funda: एक परीक्षा से बड़ी है 1400 किमी यात्रा की शिक्षा


यात्रा वृत्तांत: श्रीगंगानगर 30 नवंबर से 03 दिसंबर 2019

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करीब पंद्रह दिन द्वंद्व रहा कि राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा के ठीक एक दिन पहले 700 किलोमीटर से ज्यादा दूर छह से तयशुदा इस विवाह समारोह में पहुंचूं या नहीं। विवाह ससुराल पक्ष में भांजी का था और मैं तिथि तय होने के साथ ही निष्कपट वादा कर चुका था कि मथुरा में लग्न और श्रीगंगानगर में विवाह समारोह में अवश्य पहुंचूंगा। फच्चर तब फंसा जब एनटीए(नेशनल टेस्टिंग एजेन्सी) ने नेट की परीक्षा तिथियां घोषित की। यूं दो दिसंबर से शुरू होकर छह दिसंबर तक दो पारियों में चलने वाली इस परीक्षा में संयोग से मेरा क्रम दो दिसंबर को पहले दिन सुबह के प्रथम सत्र में आ गया।  स्पष्ट तौर पर एक दिसंबर को 700 किमी दूर विवाह के साक्षी बनकर किसी सूरत में सुबह 7.30 से 9 बजे के बीच (यही रिपोर्टिंग समय था)परीक्षा केन्द्र पर पहुंचना संभव नहीं था।
आखिर, एनवक्त परिवार का पुराना फॉर्मूला स्मरण हो आया। बात वर्ष 1987, 19 अप्रेल की है। मेरे ताऊजी के सुपुत्र और हमारी पीढ़ी के सबसे बड़े भाई साहब का विवाह था। मैं और ताऊजी का सबसे छोटा पुत्र तब 7 वीं कक्षा में थे। कोटा शहर के स्कूल में हमारा दाखिला था। संयोग से विवाह की तिथिको हमारी वार्षिक परीक्षाएं आ गई। तत्समय लगभग संयुक्त परिवार में चिंतन-मनन के बाद ताऊजी और दादाजी ने तर्क सहित निर्णय सुझाया। यह कि, परीक्षा हर साल होगी, भाई का विवाह सिर्फ अभी एक ही बार होना है। मतलब साफ था। परिवार को प्राथमिकता देनी है, शादी में ही रहना है। हालांकि तब पिताजी के शिक्षा विभाग में प्रभाव के चलते हम दोनों भाइयों का एनवक्त जिला इंस्पेक्टर की अनुमति से पैतृक गांव चेचट के हाईस्कूल में प्रवेश हुआ। हमने वहां विवाह का आनन्द भी लिया और परीक्षा भी दी।
नेट की परीक्षा में दोनों का मध्यमार्गी विकल्प अब संभव नहीं था। परीक्षा केन्द्र बदला नहीं जा सकता। लिहाजा, परिवार के सर्वोच्च न्यायालय (बुजुर्गों) के 32 वर्ष पुराने निर्णय के मुताबिक परिवार प्राथमिकता और परीक्षा त्याग का विकल्प ही शेष था। यहां नेट की परीक्षा वर्ष में दो बार होने का आश्वासन मन को दिया जा सकता था। इससे पहले वर्ष 2014 में दिसंबर में सफल/पात्र घोषित न होने का तर्क भी विवाह के समर्थन में मजबूती दे रहा था। यूूं भी बीच के 5 साल आवेदन ही नहीं किया था।

सभी तर्कों से मजबूती मिलने के बाद आखिर श्रीगंगानगर का सहोदर के साथ यात्रा का रेल बर्थ आरक्षण करा लिया गया। 30 सितंबर को शाम 5 बजकर 20 मिनट पर हमारी कोटा-श्रीगंगानगर ट्रेन से यात्रा शुरू हो गई। जाते वक्त रात करीब साढ़े 10 बजे तक जयपुर तक की यात्रा रूटीन ही रही। वर्ष 2013 सितंबर से 19 मार्च 2015 तक बाडमेर पोस्टिंग के दौरान इसी ट्रेन से जयपुर तक यात्रा होती थी, तो नया कुछ लगा नहीं। इसके बाद बर्थ खोलकर सोने का स्वभाव रहता था तो इस बार भी नींद को चले गए। पहली बार थार आंचल और राजस्थान के सुदूर इस अंतरराष्ट्रीय सीमावर्ती जिले की ओर जा रहा था। अन्य ट्रेनों की चिल्लपौं के मुकाबले अपेक्षाकृत शांत स्वभावी इस ट्रेन में कब आगे के स्टेशन फुलेरा, सांभर, मेड़ता वगैरह आते रहे पता ही नहीं चला। बीकानेर में कुछ आवाजों से नींद टूटी। लेकिन अधकचरी ही रही।

चाय पसंद न आए तो पैसे वापस!

 सुबह के आठ बजे के ठीक ऊपर घड़ी के निकलते ही ट्रेन के हल्के होने के साथ नींद हल्की हुई। करीब 3 मिनट में ट्रेन के पहिए रुक गए। लत के मुताबिक चाय की तलब हुई। तुरुंत दरवाजे की ओर गया। आवाज लगाई, भाईजी दो चाय देना। हमारे स्वर ने उसे परदेसी होने का संदेश दे दिया। कुछ सैकंड में वह आया। बोला-सरजी, पीलीबंगा की चाय है, स्वाद पसंद न आए तो पैसे वापस। मैं हंसकर बर्थ पर चाय लेकर लौटा। वह फिर कोच में चढ़ा और यही आवाज लगाई, पीलीबंगा की खास चाय, चखकर देखें, स्वाद पसंद न आए तो पैसे वापस। चाय की ही तरह अपनी मिठास, चातुर्य और स्वाद के विश्वास से उसने यात्रियों का भरोसा जीता। वहां बैठे गिने चुने शेष यात्रियों में से ज्यादातर ने उस स्टेशन वेंडर से चाय पी। पैसे वापस करने की नौबत किसी को नहीं आई।


हम टोकते हैं तो गले पड़ जाते हैं...

नींद अब काफूर हो चुकी थी। यूं भी नए क्षेत्र को देखने की ललक थी। आगे हनुमानगढ़ आया। करीब एक घंटे बाद। ठंड ने अपना रुतबा रात को ही बता दिया था। यहां से ट्रेन पुन: विपरीत जानी थी। इसलिए इंजन बदलना था। यानी करीब 15 मिनट व्यतीत करने थे। लोगों से बात के बहाने नीचे उतरा। एक वेंडर से पुन: चाय ली और चुस्की लेते हुए पकौड़ी वाले के यहां आ गया। आपका समझौता दिखता है कि चाय वह बेचेगा और पकौड़ी आप...ऐसा कहते हुए मैंने मुस्कुराते हुए मानमल तंवर नाम लिखी स्टॉल के इस वेंडर से चर्चा छेड़ी। फिर इस सीमावर्ती इलाके में ट्रेनों के साधन समेत लोक व्यवहार पर भी बात हुई। स्टेशन साफ दिखा तो पीएम #नरेन्द्र_मोदी की तारीफ सामने आए। साथ ही पीड़ा भी झलकी। बोला-सरजी, 19 करोड़ का ठेका है चार स्टेशनों पर सफाई का। आठ-आठ घंटे की शिफ्ट में चौबीस घंटे सफाई हो रही है। मैंने कहा, लोग जैसे-जैसे गंदगी फैलाने से परहेज करेंगे, बजट घटता जाएगा। सुनते ही तपाक से बोला- अभी देख लो सरजी, जिसे ठेका दिया उसे तो पोछा फेरना ही है, साफ है तब भी चलेगी पोछा मशीन। लोग ट्रेन से प्लेटफॉर्म पर फेंक जाते हैं। हम टोकते हैं तो गले पड़े जाते हैं कि तेरा क्या है। लेकिन मैं तो टोकता हूं। उसने पीड़ा जताई कि लोग मान जाएं और कचरा पात्र में कचरा डालें तो फीडबैक के आधार पर शिफ्ट कम हो सकती है, बजट 19 करोड़ का आधा हो सकता है। इसी वेंडर ने हमें यहां से श्रीगंगानगर की यात्रा अवधि 40 मिनट बताई। ठीक 10 बजकर 32 मिनट पर हम गंतव्य स्टेशन पहुंच गए।


मानव जब जोर लगाता है

रास्ते में सुबह के वक्त ही ससुराल पक्ष से बहिनजी और भानेज ने लोकेशन पूछकर स्टेशन पर लेने आने का आग्रह कर दिया था, लिहाजा उन्हें सूचना दे दी गई। महज 5-7 मिनट में गाड़ी आ गई। तब तक के समय का उपयोग हमने नजर दौड़ाने और सेल्फी (फोटो) लेने में किया। कुछ ही मिनट में हम विवाह निमित्त किराए पर लिए अस्थाई आवास पहुंच गए। शाम को पाणिग्रहण के अलावा और कोई आयोजन इस दिन था नहीं। तुरंत स्नान आदि कर तैयार हुए। शहर भ्रमण को मन बनाया। सर्व प्रशंसित स्थान #जगदंबा_अंध_विद्यालय बताया गया।यह एक तपोस्थली। दस रुपए सवारी की दर से हम छह जने करीब 7 किलोमीटर दूर इस अंध विद्यालय में पहुंचे। शाम के 4 तब तक बज चुके थे। भव्य दरवाजे की शालीनता में मानो चुंबक सा अहसास था। दरवाजे पर थोड़ी देर में बच्चे कहीं से कतारबद्ध आए और अंदर चले गए।  अपने मोबाइल कैमरे में कुछ कैद करने की नीयत से हम बढ़ रहे थे। लम्बे चौड़े परिसर में लगे होर्डिंग देख समझ नहीं आया कि किसके हैं। आधा किमी अंदर एक और भव्य दरवाजे ने आंखें खोल दी। वह नि:शुल्क उपचार में सेवारत नेत्र चिकित्सालय का प्रवेश द्वार था। विहंगम परिसर में दांई ओर विशेषयोग्जन नेत्रहीन बच्चों का स्कूल था। सामने #नागेश्वर_महादेव_तीर्थ नाम से भव्य क्रिस्टल मंदिर। मंदिर के नीचे अद्भुत शिल्प और रचनात्मकता के संदेश से तैयार की गई गुफा। एक घंटे तक हम इन सब को निराहते रहे। करीब 15 साल पहले यहां कई माह रह चुके अजय भाई साहब(ससुराल पक्ष में) ने बताया कि यह सब एक संत ने बनवाया है। उन्हीं की परिकल्पना थी। वे स्वयं उनसे डेढ़ दशक पूर्व मिले थे। अब तक की निस्वार्थ भव्यता में जो कुछ खटक रहा था उसका उत्तर भाई साहब से मिल गया। वाकई ऐसा समर्पण किसी संत के ही वश में था। अन्यथा युग की रफ्तार में अकलुषित सृजन कहां संभव!


कन्या बन सकती है देवी


मंदिर व गुफा के दर्शन करने और आशुतोष भैया(श्रीमतीजी के भतीजे) के साथ शूटिंग में हमें साढ़े पांच बज चुके थे। लगातार अस्थाई आवास से फोन आ रहे थे। विवाह समारोह स्थल सबको पहुंचना था। हम निकलने लगे कि गैटमैन की तरह बैठे संभ्रांत से दिखने वाले सज्जन हमे परदेसी होने के नाते स्थान का महत्व और जीवन दर्शन समझाने लगे। साथ में छवि बहिनजी (भतीजी) को देख बोले-बेटी जिस घर में रहती है वो स्वर्ग है। बेटा मन में छल, द्वेष नहीं लाना, सबका भला सोचो। घर में कोई भी कुछ कहे आपके भले के लिए तो नाराज न हो, कुछ गर्म भी कह दे तो जाने दो। मन को निर्मल रखा तो बेटी साक्षात् देवी ही है और उसकी कही हर बात देवी के वरदान की तरह घर में सत्य साबित होगी। स्वर्ग हो जाएगा घर।
फिर उन्होंने बेटी के सम्मान और देवी स्वरूप बनाने के रास्ते बताए। उनसे विदाई लेकर हम जूते पहन रहे थे तब किसी ने बताया कि वे सज्जन भारतीय सेना से सेवानिवृत्त कर्नल हैं। वे इसी स्थान को समर्पित हैं। निर्मल मन पर ही उनका जोर रहता है, इसी को वे ईश्वर प्राप्ति का मार्ग मानते हैं। महात्मा जी से हमारी मुलाकात नहीं हो पाई, ना ही हमने उनके बारे में किसी से पूछा। फुर्ती से बाहर आकर ऑटो को हाथ दिया और आवास आ पहुंचे।
वापसी
रात को विवाह समारोह गरिमामय तरीके से सम्पन्न हो गया। पिताजी के बारंबार आग्रह के बावजूद कोट पेंट सूट ना लाने नतीजा यहां दोनों भाइयों को सर्दी में ठिठुकर भुगतना पड़ा। ऐसा उन सभी के साथ हुआ जिन्होंने बड़ों की राय के विपरीत 28 तारीख तक बनी हुई गर्मी पर भरोसा किया और मौसम एन मौके 30 तारीख की रात को धोखा दे गया। खैर, अगले दिन दो दिसंबर को विदाई और दुल्हन का पगफेरे की रस्म पूरी हो गई। दिन में कुछ समय एक बालाजी मंदिर में दर्शन को गए। यह अंध विद्यालय के समीप था लेकिन तब तक हमे इस बारे में पता नहीं था। सालासर की तर्ज पर विकास की इच्छा यहां के निर्माताओं स्पष्ट परिलक्षित थी।

शाम पांच बजकर 40 मिनट पर हमारी ट्रेन थी। वही श्रीगंगानगर- कोटा। वक्त के ठीक पहले हम पूरी ताकत लगाकर स्टेशन आ पहुंचे। ठीक समय पर ट्रेन धड़धड़ा करती आगे बढऩे लगी। पीछे छूटता गया वो क्षण जो आते वक्त हमसे जुड़ा था। वापस पीलीबंगा में चाय के पैसे वापस की याद ताजा हुई, उसे नजरों ने खोजा लेकिन इस बार नियति ने उसे हमारी बोगी के पास नहीं भेजा। रात पौने 9 बजते बजते हमने बर्थ खोल ली। श्रीमतीजी, बेटी डिम्पी विश्राम को लेट गए। मैं अपनी टीम के शिशु यूट्यूब चैनल (सुजलाम-सुफलाम) के लिए कुछ तैयार करने में व्यस्त रहा। आंखों के तकाजे पर मैं भी 11 बजे शयन को लेट गया। आठ डिग्री की ठंड का अपना असर था ही। कंबल शॉल चारों में एडजस्ट कर हम  सभी सो गए। सुबह साढ़े  7 बजे आंख खुली तो ट्रेन सवाईमाधोपुर स्टेशन पर थी। दोनों भाइयों ने चाय का आनन्द लिया। ट्रेन चली तो मौसम की तासीर को कैमरे में कैद किया। 10 बजे हम कोटा लौट आए। मध्यवर्गीय परिवारों की शाश्वत परंपरा के मुताबिक विवाह के दृष्टांतों में दिन गुजर गया। अगली सुबह अखबार में नेट परीक्षा से जुड़ा समाचार था। मैंने अपनी तिथि का जिक्र पिताजी से कर दिया कि दो को पेपर था। एक बारगी तो उन्होंने कहा कि दे सकता था, फिर हंकर बोले-वैसे अपने परिवार का फॉर्मूला तो यही था कि परीक्षा हर साल होती है, और शादी एक बार। मैंने उसमें ठहाका जोड़ा, नेट की तो हर छह माह में होती है। अखबार वाचन के बाद रोजमर्रा का रूटीन शुरू हो गया। .......वाकई एक परीक्षा को भले ही छोड़ा लेकिन जीवन के कई तजुर्बे वहां से लेकर लौटे हैं। वे परीक्षा कक्ष में कम्प्यूटर स्क्रीन के सामने तो कम से कम कतई नहीं मिलते।

फंडा यह कि 
-#बुजुर्गों के बताए रास्ते कभी गलत दिशा में नहीं जाते।
-परिवार से समाज और राष्ट्र है। इसी के लिए शिक्षा की जरूरत। घर, परिवार, समाज के विकास का साधन है #शिक्षा_कॅरियर। साध्य को केन्द्र में रखकर ही निर्णय हो।
-ऐसे द्वंद्व में छूटने से ज्यादा पाने का ईश्वर आपके लिए खोल देता है, बशर्ते हम उनके दूत अपने पूर्वजों बुजुर्गों के बताए रास्ते पर बढ़ें।

-धीतेन्द्र कुमार शर्मा
dhitendra.sharma@gmail.com/
Youtube Channel; sujlam suflam

To See The Vedio please Click below link 
https://www.youtube.com/watch?v=Gn-PIqZe6xA&t=87s
https://www.youtube.com/watch?v=vDTgSt1ibXQ&t=151s

Sunday, December 8, 2019

#Life_Funda: The Way to Go




Why Should I Kill my soul

Why should I,
               kill my soul,
I am a Sovereign,
              whole and sole,


Why should one,
               buy my Eye,
Or should dream,
               keep me fry,


I am a worrier, 
             neat and clean,
Neither a drinker,
            nor for queen,


Running a mission,
            having a goal,
Why one dreaming,
            I am a ball,


Be ready to do,
             not to die,
Calling the earth,
           and open sky.

-
Dhitendra Kumar Sharma
(written on November 25, 2019)
Youtube Channel; sujlam suflam


Saturday, November 23, 2019

#Life_Funda; #कुत्ते_की_मौत



रोचक लेकिन  सबक परक


प्रसंग सवा माह पुराना (13 Nov 2019) लेकिन रोचक है। सबक परक भी। चार दिन पहले (21 Nov 2019) को एक विवाह समारोह में उपस्थिति के लिए रामगंजमंडी के पास स्थित खैराबाद कस्बे में जाते -आते वक्त एक बार फिर उसी स्थान से निकलना हुआ तो याद ताजा हो गयी।

पारिवारिक आयोजन में पैतृक गांव चेचट के पास निमोदा माताजी जाना हुआ। मैं परिजनों के साथ अपनी साबुनदानी (5 सीटर छोटी कार, बस वाले प्राय: इन्हें इसी नाम से बुलाते है) में था। नेशनल हाई वे 52 फोरलेन पर केबलनगर के आस पास एक श्वान मुक्त भाव में नाच रहा था। मैं अपनी तरुन्नम में 100 की रफ्तार में चल रहा था। श्वान के सड़क पर गोल-गोल यूँ नाचने पर नजऱ पड़ी तो ब्रेक लगा बहुत ही धीमे उस स्थान से गाड़ी निकाल ली। आगे की सीट पर बैठे मामाजी के बच्चे 11 वर्षीय सिद्धि और लड्डू के बाल मन में जिज्ञासा हुई तो उन्होंने धीमे होने की वजह और श्वान की हरकत के बारे मे मुझसे पूछा।

मैने उन्हें पहले श्वान के बारे में बताया कि वह नही नाच रहा है, उसके सिर पर मौत नाच रही है। रही बात बेहद धीमे होने की तो कारण यह कि उसे तो मरना है, मृत्यु तय, अपन छूने तक का भी क्यों निमित्त बने।
#अधीर_कोई_आएगा, #खेल_खत्म_हो_जाएगा।

बच्चों को यह समझाकर मैंने गाड़ी को फिर रफ़्तार दी। आयोजन के बाद उसी दिन शाम 7 बजे करीब वापस उसी हाई वे से हम लौटे। लगभग उसी स्थान पर (अब रोड के दूसरी साइड ) एक काला श्वान मरा पड़ा था।

अभी भी सिद्धि आगे बैठी थी। मैं कुछ नहीं बोला, लेकिन सुबह बताई बात उसे स्ट्राइक कर गयी। वो तपाक से बोली , भैया ये शायद वही कुत्ता है। जगह ठीक वही थी, श्वान का रंग और आयु भी समान सी, तो हमने भी 'शायद' लगाते हुए हामी भर दी। और, आगे बढ़ गए। मन में ईश्वर की लीला के खयाल चलते रहे।
और #बुजुर्गों_के_बताए_सबक , #जिंदगी_जीने_की_कला #राह_चुनने_की_पहचान का स्मरण रहा।

#फंडा : यह कि आप जीवन में धैर्य रखें, जिसके सिर पर मौत नाच रही उसकी #कुत्ते_की_मौत तय है, आप सिर्फ धैर्य के साथ शालीनता से निकल लें।

-धीतेन्द्र कुमार शर्मा
dhitendra.sharma@gmail.com
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Thursday, November 14, 2019

मैंने जीवन चलते देखा है

मैंने जीवन चलते देखा है,

अपने खिलते ढलते देखा है,

आने की होती तय अवधि,

अपने औचक जाते देखा है,

हत्या देखी और हत्यारे,

बच्चे- वृद्ध और युवा कुँवारे,

सपनो को गलते देखा है

मैंने जीवन चलते देखा है।


पर हर अरुणोदय होता नूतन,

जीवन का अदभुत परिवर्तन,

तृण तृण से फिर नीड सृजन,

भावों को पलते देखा है,

मैंने जीवन चलते देखा है।


सुबह हुई तो साँझ भी होगी

यही प्रभु की माया,

सृष्टि सृजन से नियत यही सब,

कोई समझ न पाया,


पुरुषार्थ-दीप के सम्मुख भीरू,

अंधकार जलते देखा है,

हाँ, मैंने जीवन चलते देखा है।।


-धीतेन्द्र कुमार शर्मा

खुल्ला बोल: ब्राह्मण की पहचान फरसा या वेद!

संदर्भ- सामाजिक आयोजनों का संदेश क्या? -धीतेन्द्र कुमार शर्मा- इस आलेख पर आगे बढऩे से पहले मैं विप्र समुदाय से क्षमा प्रार्थना करते हुए (क्...