Friday, April 21, 2017

खुल्ला बोल: Yes # She Can...

संदर्भ- शराबबंदी और महिला आन्दोलन

''शराब पीने और पिलाने वाली सरकार का बहिष्कार करना चाहिए।''
- लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक



-धीतेन्द्र कुमार शर्मा-
बूंदी के छपावदा गांव में एक युवक ने गुजरे शनिवार(15 अप्रेल को) अपनी मां का सिर शराब के नशे में सिर्फ इसलिए फोड़ दिया कि वह उसे शराब पीने के वास्ते पैसे नहीं देती। शराब पीकर पति-पत्नी में झगड़ा अक्सर मीडिया में आता है। यही झगड़ा कभी मासूम बच्चों की हत्या, तो कभी पत्नी के बच्चों समेत आत्महत्या की परिणति के रूप में छपता-ब्रॉडकास्ट होता है। शराब से सर्वाधिक प्रताडि़त महिलाएं ही हैं। और, यही वजह है कि राजस्थान की धरती के विभिन्न अंचलों में ये 'मर्दानियां' शराब के खिलाफ खम ठोक रही हैं। इसके लिए वे किसी भी हद तक जाने को राजी हैं। बारां शहर में कानून के रखवालों ने नहीं सुनी तो उन्होंने खुद कानून हाथ में ले लिया। हिरासत तक में पहुंच गई पर आन्दोलन नहीं छोड़ा।  उदयपुर में मचा बवाल किसी से छुपा नहीं। और, कमाल देखिये कि सब जगह, मांग है कि ये दुकानें आबादी या मंदिर क्षेत्र से हटें या बंद हों। राजसमंद के एक गांव में तो बाकयदा मतदान के बाद शराब की दुकान हटानें का निर्णय किया गया।  यहीं ६ और गांवों में वोटिंग की मांग को लेकर महिलाएं आंदोलनरत हैं।  कोटा में लगातार विरोध के बाद अटवाल नगर की दुकान का स्थान आबकारी विभाग को बदलना ही पड़ा।

यह सही है कि हर बार नए ठेके होने पर इस तरह के विरोध-प्रदर्शन होते हैं। उनके पीछे ऐसे लोग भी होते हैं जो ठेका लेने से वंचित रह गए। कुछ दिन के विरोध के बाद ये ठंडे पड़ जाते हैं। लेकिन, इस बार की फिजां कुछ अलग दिख रही। एक तो सामान्य प्रदर्शन ना होकर यहां महिलाएं ही मोर्चे पर हैं। दूसरे नारी शक्ति को मीडिया का भी अघोषित समर्थन मिल रहा है। शायद यह भी एक वजह है कि उनका मनोबल ऊंचा है और सरकारी मशीनरी का कमजोर!  एक महत्वपूर्ण तथ्य यह कि शराबबंदी को लेकर अनशन में ही दिवंगत हो गए पूर्व विधायक गुरुचरण छाबड़ा की पुत्री पूजा छाबड़ा सक्रिय हुई हैं। वे प्रदेश के विभिन् न स्थानों पर जाकर महिलाओं का हौसला बढ़ा भी रही। पर, विडंबना यह कि महिलाओं का कोई प्रदेश या राष्ट्रव्यापी संगठन सामने नहीं आया है। धमक जरूर पूरे देश-प्रदेश में बज रही।

शराबबंदी की बात करें तो देश में गुजरात, मिजोरम, मणिपुर, नागालैंड और बिहार में पाबंदी है। और, महत्वपूर्ण यह कि इस पाबंदी में भी नारी आन्दोलनों की ही भूमिका रही। बिहार का तो खुला उदाहरण है। शराबबंदी के मुद्दे पर नीतीश कुमार सत्ता में दुबारा आए। उन्होंने आते ही अपना वादा निभाया भी। वे तो दावा भी करते हैं कि शराबबंदी के बाद औसत बिहारी का जीवन स्तर उठा है। तमिलनाडु में एक कानून की छात्रा नंदिनी आनन्दन ने 200  विद्याथियों की चेन बनाई है जो वहां शराब बंदी के लिए संघर्ष कर रही। वे स्पष्ट कहती हैं कि सरकार ने 13 से 14 साल की पीढ़ी को बर्बाद कर दिया। वहां महिलाओं और विद्यार्थियों के विरोध का ही नतीजा है कि चुनाव में यह मुद्दा बना और शपथ ग्रहण करते ही तत्कालीन मुख्यमंत्री जे. जयलिता ने सरकार समर्थित शराब की दुकानों के घंटे घटा दिए। साथ ही 500  दुकानें बंद भी कर दी। हालांकि, पूर्ण शराबबंदी नहीं हुई। संघर्ष अभी जारी है ही।

हालिया यूपी चुनाव में भी नीतीश कुमार ने शराबबंदी के मुद्दे को उठाया। भाजपा को दबे स्वर मानना भी पड़ा। अभी वहां भी महिलाएं खम ठोक रही हैं। मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी और आबकारी मंत्री ने भी स्पष्ट किया कि जहां विरोध है और लोग शराब के खिलाफ हैं, वहां जांच के बाद दुकानें हटा दी जाएंगी। लोगों की भावनाओं का आदर होगा।

अब राजस्थान वापस आ जाइये। चुनाव हमारे भी नजदीक ही हैं। साल 2018 के दिसंबर में होंगे। महिलाओं की मांग को जिस तरह स्वर मिल रहा, समर्थन मिल रहा, इससे कुछ आस बांधी जा सकती है। माहौल बनने लगा है। जरूरत केवल संगठित होने की है। अन्य सामाजिक संगठन अभी शायद स्वाद के लोभ में शांत बैठे हैं। पुरुषों को तो जैसे सांप सूंघ गया। धौलपुर और मप्र के मुरैना आदि इलाकों में एक संत बाबा जरूर पंचायत करके शराब छुड़ाने की मुहिम चला रहे। डेढ़ सौ से ज्यादा गांवों में पंचायत कर चुके।  बाकी 'मर्द' चुप हैं। पर कोई बात नहीं। नारी श िक्त को कमतर क्यों आंका जाए? मातएं-बहिनें अगर जुटी रहीं तो नतीजे उनके पक्ष होने की उम्मीद की जा सकती है। और, राजस्थान ही क्यों, इस साल भी कुछ राज्यों में चुनाव होने हैं। अगले साल राजस्थान के साथ ही मप्र छत्तीसगढ़ समेत 5 राजयों में चुनाव होंगे। फिर लोक सभा के आम चुनाव। अगर स्वर समवेत होते गए तो ताज्जुब नहीं ऐतिहासिक फैसला देशव्यापी हो जाए।

हालांकि दुनिया भर में पैदा होने वाली शराब का 20  फीसदी हिस्सा पी जाने वाले इस दुनिया के तीसरे बड़े शराब बाजार देश में ये इतना आसान नहीं।  हमारे ज्यादातर राज्यों की 20  फीसदी से ज्यादा, कई की तो 23 से 25 फीसदी तक राजस्व आय अकेले शराब बेचान से आती है। राजस्थान में ही 61 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का राजस्व शराब से आता है। ऐसोसिएट चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (ऐसोचैम) के कुछ साल पहले के अध्ययन में कड़वा सच ये भी सामने आया कि देश में शराब इंडस्ट्री 30  फीसदी की ग्रोथ से बढ़ रही। पूरे देश में करीब 1.45 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का शराब कारोबार है। ऐसोचैम के मुताबिक भारत में करीब 19 अरब लीटर शराब की सालाना खपत है, जिसमें 48 फीसदी हिस्सा देसी दारू का है। जरा सोचिये, देसी दारू कौन हलक में ज्यादा उतारता है। जाहिर है, गरीब तबका।  बर्बाद भी वही हो रहा। पर महिलाएं सभी तबके की पीडि़त।

माना कि, तथ्य और सरकारी राजस्व लोभ के मद्देनजर चुनौती विकट है!  पर, नारी शक्ति हार मान लें चुनौती ऐसी भी नहीं! शराबबंदी के खिलाफ नारी शक्ति का संघर्ष पुराना है। ऐतिहासिक भी! ब्रिटिश शासित भारत में साल 1925 में करीब 30 हजार महिलाओं ने कांग्रेस के आह्वान पर तत्कालीन वायसरॉय लॉर्ड रीडिंग को शराबबंदी की मांग को लेकर ज्ञापन दिया था। तब ब्रिटिश भारत की जनसंख्या करीब ३२ करोड़ थी। यानी तकरीबन 9-10 फीसदी महिलाएं एकजुट हो गई थी। आज भले ही कांग्रेस मरणासन्न है, पर नारी शक्ति वही है। बल्कि अधिक सशक्त! जरा सोचिए, उसी अनुपात में आज की 10 फीसदी नारी भी एकजुट हाकर देशव्यापी मुहिम छेड़ दें तो...? कौन रोक पाएगा उन्हें तब! खास बात यह कि लोकसभा चुनाव भी 2019 में हैं। महात्मा गांधी की 150 वीं जन्म जयंती महोत्सव भारत सरकार मनाएगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार गांधीजी के 'चश्मे और झाडू' को हथिया ही चुकी। स्वच्छता का तोहफा देने की मुहिम चला रही। गांंधीजी खुद शराबबंदी के बड़े पैरोकार रहे। खुद उन्होंने आंदोलन चलाए। अपने अखबार यंग इंडिया में तो उन्होंने इतना तक लिखा कि उन्हें एक घंटे के लिए भी भारत का शासक बना दिया जाए तो पहला काम बिना कोई क्षतिपूर्ति दिए शराब की दुकानें बंद कराने का करेंगे।  ऐसे में गांधीजी को 150 जयंती पर शराबबंदी का तोहफा क्यों नहीं दिया जा सकता!

मानकर चलिये, रणनीतिक लिहाज से सर्वाेत्तम अनुकूल वक्त है।  देश का नेतृत्व भी ऐसे व्यक्ति के हाथ में है जिसने मुख्यमंत्री रहते अपने प्रदेश में शराब पर पाबंदी लगाई। राष्ट्रव्यापी समर्थन और मुहिम से ताकत मिले तो असंभव कुछ नहीं। और, यह ताकत बेशक नारी शक्ति में निहित है। भरोसा करें, वे प्रदेश ही नहीं, भारतभूमि पर शराबबंदी की मिसाल बन सकती है, Yes  # She Can...


                                                                                            dhitendra.sharma@epatrika.com/ dhitendra.sharma@gmail.com                        (दिनांक 21 अप्रेल 2017 को लिखित/ प्रकाशित)

Sunday, March 26, 2017

खुल्ला बोल: बहुत कुछ छिपा इस बदजुबानी में....

संदर्भ- भाजपा विधायक भवानीसिंह राजावत की बयानवीर राजनीति
-धीतेन्द्र कुमार शर्मा-
 तीन बार विधायकी (लाडपुरा कोटा) का चुनाव जीतने और पहली बार में ही प्रदेश सरकार में संसदीय सचिव पद पर कामकाज के अनुभव वाले भाजपा नेता भवानी सिंह राजावत की अमर्यादित (बल्कि अशिष्ट) बयानबाजी को कोई सिर्फ उनकी बदलती फितरत से जोडक़र देख रहा है तो असहमति जताने के अपने अधिकार का मैं उपयोग करना ही चाहूंगा। राजावत कोई नासमझ नहीं हैं और ना ही अपरिपक्व राजनेता। पिछली वसुंधरा राजे सरकार (2003-2008 ) में संसदीय सचिव रहते उनकी संजीदगी के कई उदाहरण हैं। सीएम राजे के निकट और वफादार लोगों में उनकी गिनती होती थी। तब कोटा शहर के दोनों युवा विधायकों को संसदीय सचिव बनाया गया था। लेकिन, नेतृत्व के प्रति व्यक्तिगत निष्ठा में उनके अंक अधिक होते थे। अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद 2008 के चुनावों में जनता ने राजे सरकार को विदा कर दिया लेकिन कोटा के दोनों युवा नेता विधानसभा पहुंचे। और, 2013 में सत्ता में भाजपा की प्रचण्ड बहुमत (163 / 200) के साथ वापसी हो गई। कई कद्दावर नेता जीत आए। इधर, गंगा में भी काफी पानी बह गया। वक्त के कई हिस्से करवट ले चुके थे।  शीर्ष नेतृत्व और प्रदेश नेतृत्व के बीच खाई और खींचतान की खबरें भी सुर्खियां रहने लगी। खेमेबंदी चुनाव के वक्त ही हो गई थी।  लिहाजा, चुनाव जीतने के बाद राजे सीएम बनने में कामयाब तो हो गई लेकिन अनिश्चितता के बादल शुरू से मंडराते रहे। इन हालात में बड़ी चुनौति थी मंत्रिपरिषद गठन। जाहिर है, खेमेबंदी और अनिश्चितता को टालने या स्थिर बनाए रखमें सक्षम सिपहसालार ही तय हुए। लिहाजा, मंत्रिपरिषद में इन स्वयंभू वरिष्ठों को स् थान नहीं मिला।  अन्दरखाने की बदलती राजनीति और प्रबन्धकीय कौशल के चलते एक को दिल्ली की राजनीति में भेज दिया गया। उन्होंने वहां भी अपना कौशल दिखाते हुए और स्थानीय प्रबन्धन मजबूत रखते हुए जनचेतना में नियमित उपस्थिति दर्जगी को सुनिश्चिित कर लिया।
इधर, राजावत अकेले पडऩे लगे। कोई दायित्व भी नहीं जिससे ऐसी उपस्थिति दर्ज होती रहे। तीन साल का इंतजार अब धैर्य देने लगा है। ऐसे में चर्चित बयानबाजी (....मगरमच्छ को गोली मार दो....हेलमेट लागू नहीं होने देंगे ...जैसे बयान इस श्रेणी में रखे जा सकते हैं। )  राजनीतिक हलकों में सस्ता और मुफीद टूल माना जाता है। जानकार इसे समझते भी हैं। इसी रास्ते को राजावत ने चुना। एक राह, छोटे तीर और निशाने कई! अव्वल तो मीडिया में जगह मिल जाती है। बल्कि फ्रंट पेज पर मिल जाती है। दूसरे, वर्ग विशेष में संरक्षणवादी छवि बन रही। आलोचक और समर्थक दोनों ही बढऩे से लोकप्रियता में इजाफे का भ्रम भी बनाया तो जा ही सकता है।
अब आप कहेंगे कि ये तो सभी एक ही ट्रेक पर चलने वाले तीर हैं! ...तो दूसरा पहलू देखिये। प्रदेश की राजनीति करवट ले रही है। अनिश्चितता चुनाव के साथ से ही थी ही। खबरें भी हैं कि  मैडम खुद भी अनसेफ मानती हैं। लोग तो पहले 2014 के आम चुनाव का इंतजार कर रहे थे। संघ कैडर से दिग्गज भाजपा नेता घनश्याम तिवाड़ी असंतोष और खुले विरोध का ध्वज उठाकर चल ही रहे। चुनाव के बाद गुलाबचंद कटारिया मैडम खेमे में चले गए लेकिन तिवाड़ी झंडा बुलन्द किए हुए हैं। समानान्तर संगठन दीनदयालवाहिनी खड़ा कर दिया है। मांग वही, नेतृत्व परिवर्तन की। केन्द्रीय नेतृत्व तक संतुलन साधकर चल रहा। पिछले दिनों संघ कैडर के ही अलवर के दिग्गज ज्ञानदेव आहूजा भी खुले विरोध में आ गए। सरकार विरोधी बयानबाजी कर संगठन और कार्यकर्ताओं के लिए संघर्ष की बात कहने लगे। कहीं न कहीं ये स्वर तिवाड़ी से मिलते हुए दिखते हैं लेकिन संतुलित और सधे हुए। ना बिगाड़ हो, ना संतुष्ट दिखें स्टाइल में!
 शायद$  इसी राह को भवानीसिंह भी साधने की चेष्टा कर रहे। अनर्गल बयानबाजी से वे कोशिश कर रहे कि असंतुष्टि का संदेश प्रदेश और केन्द्रीय नेतृत्व तक अनुशासनहीनता के चौखट छुए बिना, ....बचते हुए पहुंच जाए। तभी तो उन्होंने साशय हवाई अड्डे और हवाई सेवा के मामले में पीएम तक के विमान को नहीं उतरने देने की बात सार्वजनिक मंच से कह दी। इसे सिर्फ जुबान फिसलना मानना मूर्खता ही होगी। फिर कहूंगा कि राजावत नासमझ नहीं हैं। पीएम पर टिप्पणी से केन्द्रीय नेतृत्व तक संदेश पहुंचाने का उनका तीर निशाने पर लगा है।
पुनश्च, राजावत इस साशय बदबयानी से अपनी राजनीतिक पूंजी बढ़ाने, अंसतोष का संदेश देने और नेतृत्व परिवर्तन या वर्तमान नेतृत्व में मंत्रिपरिषद में बदलाव, दोनों ही दशा में कोई मुकाम हासिल करने का सधा हुआ प्रयास कर रहे हैं। शनिवार (25 मार्च) को उनके विधानसभा क्षेत्र में हुए एक लोकार्पण समारोह में नगर सुधार न्यास अध्यक्ष रामकुमार मेहता को मंच से ही स्पष्ट चेतावनी कि ‘आप सरकार से मनोनीत हो और मैं ढाई लाख लोगों का चुना हुआ ट्रस्टी’....आपको मेरी बात माननी ही होगी।’....में सीएम राजे के अप्रत्यक्ष विरोध (सब जानते हैं कि मेहता झालावाड़ जिले के हैं और सीएम राजे के खास होने के कारण ही उन्हें कोटा यूआईटी चेयरमैन पद मिला) और अपनी जनप्रतिनिधित्व की ताकत, दोनों का संदेश निहित था।
बहरहाल, देखना दिलचस्प होगा कि राजावत के तीर निशाने पर ही लगते हुए उन्हें अपनी मंशानुरूप मुकाम दिलाएंगे या फिर समय के साथ सुधिजन सुर्खियां अन्दर के पन्नों पर ले जाएंगे।

                                                                                             dhitendra.sharma@epatrika.com/ dhitendra.sharma@gmail.com          (दिनांक 26 मार्च 2017 को लिखित/ प्रकाशित)

Monday, March 13, 2017

खुल्ला बोल : क्रांति की राह पर भारत देश....

संदर्भ- उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों के चुनाव परिणाम-



-धीतेन्द्र कुमार शर्मा-
 जरा 6 साल पहले अप्रेल 2011 में दिल्ली में जन्तर-मंतर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल को लेकर हुए अन्ना आन्दोलन की तस्वीरें याद कीजिये। इस आन्दोलन में उमड़े जनसमुदाय और उनकी हसरतों को याद कीजिए।  फिर देश भर में साल के अंत दिसंबर तक विभिन्न स्थानों पर हुए विरोध-प्रदर्शनों की याद ताजा कीजिए। और, अगस्त 2012 और इससे पहले कालेधन व 'व्यवस्था परिवर्तन' की मांग को लेकर हुुए बाबा रामदेव के आन्दोलन को याद कीजिए।
भारत में लोग इस तरह के प्रदर्शनों में अपनी भागीदारी में फख्र महसूस कर रहे थे। बच्चे, बूढ़े, जवान सभी बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे। अब इसी दौर में दुनिया पर नजर डालें। साल 2010 में थाईलैंड में 'स्थापित व्यवस्था' के खिलाफ आन्दोलन हुए। साल 2010-2011 में आइवरी लोग सड़कों पर उतरे, 2010 से 2012 तक  ताजिकिस्तान सुलगता रहा, 2010 में ही किर्गीस्तान में दूसरी क्रांति हुई।
उधर, उत्तरी अफ्रीका और मध्य पूर्व भी दिसंबर 2010 से 2012 के मध्य तक (अरब स्प्रिंग) क्रांतियों के आगोश में रहा। सत्रह दिसंबर 2010 से ट्यूनिशिया से उठी चिनगारी ने इजिप्ट, लीबिया, यमन, सीरिया, इराक, लेबनान, जॉर्डन को अपनी जकड़ में ले लिया। इन सभी करीब दर्जन भर से ज्यादा क्रांतियों में 'स् थापित व्यवस्था और 'भ्रष्ट- राजव्यवस्था' का विरोध और बदलाव की बयार ही मुद्दा था। ज्यादातर देशों में बदलाव हुए भी और बगावत को कुचला भी गया।
अब भारत की तरफ वापस आइये। यहां कुछ 'बदलाव' का दिखावा तत्कालीन यूपीए-२ सरकार ने किया। कुछ दमन का भी। बाबा रामदेव का सलवार-सूट पहन भागने का उदाहरण सबके सामने है। लेकिन, यह भारत है। भारतवंशी प्राय: शांत-सहनशील माने जाते हैं। स्वभाव के अनुरूप भारतवंशी चुप रहे। अनडर-करंट चलता रहा। जनमत बनता गया। और, गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी उस नैराश्य में आशा बनकर उभरे। सवा सौ करोड़ देशवासियों ने उन्हें आम चुनाव में खुले हाथ समर्थन दिया।
मोदी ने भी प्रधानमंत्री पद पर पारी की शुरुआत से पहले संसद को दंडवत अपनी प्राथमिकता 'भारत माता' जता दी। केबिनेट की पहली बैठक में काले धन पर एसआईटी का गठन कर नीयत साफ जता दी। ढाई साल के शासन में मोदी की साफगोई और राष्ट्र भक्ति असंदिग्ध हो गई है। उन्होंने अपनी छवि गढ़ ली है कि 'कोई तो बंदा है जो इस सो सिस्टम को बदलने के लिए लड़ रहा है। भारत माता के स्वाभिमान की रक्षा के लिए लड़ रहा है। राष्ट्र और राष्ट्रवासियों के उत्थान के लिए 'स्थापित व्यवस्था' से संघर्ष कर रहा है।  एक पंक्ति में कहें तो वे वर्तमान व्यावहारिक राजनीति का प्रतिनिधित्व करने वाले नेताओं से इतर नैतिक प्रतिमानों की स् थापना के प्रति दृढ़ और असंभव के विरुद्ध संघर्ष करने वाले सर्वमान्य नेता बनते जा रहे हैं। इसी परिदृश्य में पांच राज्यों, खसकर उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामों को देखा जाना चाहिए। उत्तर प्रदेश में भाजपा को प्रचंड 80 फीसदी जनादेश उसी आशा की प्रतिध्वनि है जो देश नरेन्द्र मोदी में देख रहा है। उत्तराखंड में भी मोदी का जलवा रहा। मणिपुर जैसे राज्य में भाजपा का उदय भी इसी आशा की अभिव्यक्ति है। गौर से देखें तो व्यवहारवादी-यथास्थितिवादी व्यवस्था के पोषक राजनेता ध्वस्त होते जा रहे हैं। पंजाब में अकाली और यूपी में सपा-बसपा की दुर्गति बहुत कुछ कह रही। अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आन् दोलनों के बाद अरविन्द केजरीवाल (आम आदमी पार्टीं) का उदय भी व्यवस्था में बदलाव के वास्ते संघर्ष का ही स्वर था। अब पंजाब में भी आप ने अच्छा दखल हासिल किया।
अब सारे परिदृश््य को जोड़कर देखें। दुनिया भर में भ्रष्ट व्यावस्था के खिलाफ हिंसक और अहिंसक क्रांतियां और राष्ट्रवाद की ओर लोगों का रुझान, भारत में आन् दोलनों का आगाज और मोदी का उदय। न केवल उदय, बल्कि जादू-सा चमत्कारिक समर्थन!  पूरा देश मोदी के खेमे में जाता दिख रहा। यह पूरा चित्र बहुत कुछ कह रहा है। शायद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इसे भांप भी गए। तभी तो रविवार (12 मार्च) को नई दिल्ली में कार्यकर्ताओं को दिए संबोधन में उन्होंने संकेत दिए। कहा, कि उन्हें इस प्रचण्ड बहुमत में भविष्य के 'नए भारत (न्यू इंडिया)' के दर्शन हो रहे हैं। मोदी भले ही स्पष्ट नहीं कह पाए। लेकिन, लगता है देश क्रांति की दहलीज पर खड़ा है। आम भारतीय अब भ्रष्ट और राष्ट्र घाती व्यवस्था से आजिज आ चुका। युवा इसे आगे चलने देने के मूड में कतई नहीं। 'डू और डाई' का मानस दिखने लगा। बस आड़े आ रही तो वह स्वभावगत शालीनता, धैर्य, सहनशीलता जिसके लिए भारतवंशियों को दुनिया सलाम करती है। लेकिन, मानकर चलिये भारतवासियों के लिएख्मोदी अंतिम 'चुनावी लोकतांत्रिक आशा' हैं।
साल 2011 से शुरू हुआ सफर भी इतिहासकार (भविष्य में होने वाले विश्लेषणों में) क्रांति का आगाज ही मानेंगे। अभी देश लोकतांत्रिक भरोसे से आखिरी आशा पर जान छिड़क रहा है। दिल खोल कर समर्थन दे रहा। संभव है कि 2019 में देश मोदी के साथ और खुलकर आए। मोदी को सर्वांगीण मजबूती दे। देश मोदीमय हो जाए। और, तब अपने सपनों का भारत मोदी से मांगे।
बस यही विकट कसौटी होगी। मोदी सफल हुए तो अमर हो जाएंगे। अन्यथा, जैसा ऊपर कहा, देश सशक्त क्रांति की दहलीज पर खड़ा है। वर्तमान संसदीय लोकतांत्रिक चरण की पूर्णाहुति मोदी काल के साथ हो जाएगी।  फिर, संभव है नया महायज्ञ शुरू हो। महायज्ञ नए स्वराज का। ठीक वैसा ही जैसा आप और हम पुस्तकों पढ़ते हैं। 1857 से लेकर 1947 तक के चरण में। फिर नए मंगल पांडे, सुभाष बोस चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, से लेकर बाल-पाल-लाल और गांधी पैदा होंगे। और ये होंगे आपके हमारे बीच से ही। बहरहाल, पहली प्राथमिकता से दुआ की जानी चाहिए कि अहिंसा और मजबूत लोकतंत्र का पुजारी माना जाने वाला भारत शांत लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ही अपने बदलाव के उद्देश्यों को पूरा कर ले। नहीं, तो दूसरे पहलू के अभिनन्दन को देश तो तैयार है ही।  और, हम भी।
                           dhitendra.sharma@epatrika.com/ dhitendra.sharma@gmail.com        (दिनांक 13 मार्च 2017 को लिखित/ प्रकाशित)

Sunday, March 12, 2017

कहानी: तपस्या

याद पुरानीः

आज से 10 साल पहले 28 अगस्त 2007 को राजस्थान पत्रिका  के परिवार परिशिष्ट
में होली के अवसर पर प्रकाषित आपके हमारे बीच के घर परिवारों की एक कहानी;

Tuesday, August 16, 2016

कहानी: मातृभूमि

राजस्थान पत्रिका 14 अगस्त 2016  के रविवारीय परिशिष्ट में प्रकाशित माटी से प्रेम की एक कहानी...